किस सूरत में ग़ायब हो जाते हैं
आपसे पूछ तो नहीं सकते
सिर्फ़ शायदों की फ़ेहरिस्त
अपने ज़हन में
लिखते हैं
मिटाते हैं
आपके ख़यालों का बना साया ढूँढ कर
अपनी मुस्कुराहट का राज़ छुपाते हैं
कहीं कायनात को भनक ना पड़ जाए
की हम भी ख़ुश होना जानते हैं
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